बाल श्रम क्या है, इसके कारण और दुष्परिणाम क्या है? What is Child Labor in Hindi

बाल श्रम क्या है? बाल श्रम के कारण, दुष्परिणाम, रोकथाम के उपाय, कानून और सजा क्या है?

आज आपको बाल श्रम क्या है बाल श्रम के कारण, दुष्परिणाम, रोकथाम के उपाय, कानून और सजा क्या है? (What is child labor? What are the causes, consequences, prevention measures and legal punishment of child labour) की जानकारी इस लेख Bal Shram Kya Hai में विस्तार से बताई गई है।

बाल श्रम (बाल मजदूरी) की परिभाषा और बाल श्रम का अर्थ वाले आर्टिकल में बाल मजदूरी (बाल श्रम) क्या है, बाल श्रम के प्रकार क्या है, बाल श्रम के कारण, बाल श्रम के दुष्परिणाम और बाल श्रम कानून में क्या प्रावधान है के साथ साथ बाल श्रम अधिनियम कब लागू हुआ और बाल श्रम कराने की सजा क्या है जैसे टॉपिक्स कवर करेंगे। पढ़ाई करने वाले विद्यार्थियों के लिए यह लेख बाल श्रम पर निबंध (बाल मजदूरी पर निबंध) के रुप में भी लिख सकते हो। चलिए बाल श्रम क्या होता है शुरु करते है।

बाल श्रम क्या है? बाल श्रम के कारण, दुष्परिणाम, रोकथाम के उपाय, कानून और सजा क्या है?

बाल-श्रम का मतलब यह है कि 14 वर्ष से कम उम्र के बालक को काम पर लगाना गैर कानूनी है अगर कोई व्यक्ति, कंपनी या किसी होटल में किसी बालक जिसकी उम्र 14 वर्ष से कम है ऐसे बालक पर मजदूरी करवाई जाती है तो कानून विरुद्ध करवाए गए इसी श्रम को बाल श्रम कहते हैं। और श्रम करने वाले बालकों को बाल श्रमिक और बाल मजदूर कहते है। इस प्रथा को कई देशों और अंतर्राष्ट्रीय संघठनों ने शोषित करने वाली प्रथा माना है।

बाल श्रम के कारण

भारत जैसे देश में जहाँ जनसंख्या के लगभग 40 प्रतिशत से अधिक व्यक्ति निर्धनता की स्थितियों में रह रहे हैं, वहाँ बाल-श्रम एक बहुत ही गम्भीर विषय है। बच्चे निर्धनता के कारण विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करते हैं। और उनकी कमाई के बिना उनके परिवारों का जीवन-स्तर और भी गिर सकता है। उनमें से कई बच्चों के तो परिवार ही नहीं होते या सहारे के लिए उनसे आशा नहीं कर सकते। बाल-श्रम का प्रमुख कारण निर्धनता यानी गरीबी है। बच्चे या तो अपने माता-पिता की आय बढ़ाते हैं या परिवार में वे अकेले ही वेतनभोगी होते हैं। दूसरा प्रमुख कारण सस्ते मजदूर पाने के लिए निहित स्वार्थों द्वारा जानबूझकर उत्पन्न किया जाता है।

यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि निर्धनता के कारण इन बच्चों को श्रम कार्यों में सामान्यतः उनके अभिभावक ही धकेलते हैं, जहाँ थोड़े से पैसे के लिए उनकी जिन्दगी तबाह हो जाती है। इनके दिन की शुरूआत ही गाली-गलौच और लानत-मलामत से होती है। ऐसी परिस्थितियों में इनका कुण्ठित होना स्वाभाविक है। यही कुण्ठित मन धीरे-धीरे नशे की ओर चला जाता है।

बाल-श्रभ एक ऐसा सामांजिक अभिशाप है जो शहरों में, गाँवों में चारों तरफ मकड़जाल की तरह बचपन को अपने आगोश में लिए हुए है। खेलने कुदने के दिनों में कोई बच्चा बाल श्रम (बाल मजदूरी) करने को मजबूर हो जाए, तो इससे बड़ी विडम्बना किसी भी समांज के लिए और क्या हो सकती है। बाल-श्रम से परिवारों को आय स्रोतों का केवल एक छोटा-सा भाग ही प्राप्त होता है, जिसके लिए गरीब परिवार अपने बच्चों के भविष्य को गर्त में झोंक देते हैं। गोपालदास ‘नीरज’ ने बाल-श्रम की इसी भयावह स्थिति का वर्णन कहते हुए लिखा है –

“जिनको जाना था यहाँ पढ़ने को स्कूल,जूतों पर पाँलिश करें वों भविष्य के फूल।”

वास्तव में बाल श्रम मानवाधिकारों का हनन है। मानवाधिकारों के अन्तर्गत शारीरिक, मानसिक एवं समाजिक विकास का हक पाने का अधिकार प्रत्येक बच्चे को है। लेकिन यथार्थ में स्कूल, खेल, प्यार-स्नेह, आत्मीयता आदि इनकी कल्पना में ही रह जाता है। कूड़े के ढेर से रिसाइक्लिग के लिए विभिन्न सामग्रियों को बटोरने वाले बच्चों में समय से पूर्व ही ऐसी कई बीमारियोँ घर कर जाती हैं, जिन्हे छोटी उम्र से ही उन्हें ढोना पडता है। कूड़े के ढेरों से उन्हें कई ऐसे संक्रामक रोग जकड़ लेते हैं, जिनसे बचपन एवं जवानी का उन्हें पता ही नहीं चल पाता। सीधे बुढ़ापे में ही उनके कदम चले जाते हैं।

बाल श्रमिकों का शोषण

बाल श्रभिकों का शोषण, रोजगार की खतरनाक परिस्थितियों का जोखिम, कई घण्टे काम करने के बदले दिया जाने वाला अल्प वेतन आदि ऐसे महत्त्वपूर्ण मुद्दे हैं जो बाल श्रम से जुड़े होते हैं। शिक्षा को छोड़ने के लिए बाध्य होकर, अपनी आयु से अधिक दायित्वों का निर्वाह करके ये बच्चे कभी नहीं जान पाते कि बचपन क्या होता है।

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बाल श्रम के रोकथाम के उपाय

भारतीय संविधान में बाल-श्रम को रोकने या हतोत्साहित करने के लिए विभिन्न व्यवस्थाएँ की गई हैं, जैसे चौदह वर्ष से कम आयू के किसी बालक को किसी कारखाने में काम करने के लिए या किसी जोखिम वाले रोजगार में नियुक्त नहीं किया जाएगा (धारा 24), बाल्यावस्था और किशोरावस्था को शोषण तथा नैतिक एवं भौतिक परित्यक्ता से बचाया जाएगा धारा 39 (1)], संविधान के प्रारम्भ होने से 10 वर्षों की अवधि में सभी बालकों की, जब तक वे 14 वर्ष की आयु समाप्त नहीं कर लेते, राज्य नि. शुल्क और अनिवारये शिक्षा की व्यवस्था करने का प्रयत्न करेगा (धारा 45) आदि।

बाल श्रम के दुष्परिणम

अधिकांश कार्यरत बच्चे ग्रामीण क्षेत्रो में केन्द्रित हैं। उनमें से लगभग 60% दस वर्ष की आयु से कम है। व्यापार एवं व्यवसाय में 23% बच्चे संलग्न है, जबकि 36% बच्चे घरेलू कार्यों में। शहरी क्षेत्रों में उन बच्चों की संख्या अत्यधिक है, जो कैण्टीन एवं रेस्टोरेंटों में काम करते हैं या चिथड़े उठाने एवं सामानों की फेरी लगाने में संलग्न हैं, लेकिन वे रिकार्डे में नहीं (Unrecorded) हैं। अधिक बदकिस्मत बच्चे वे हैं, जो जोखिम वाले उद्यमों में कार्यरत हैं। बच्चे हानिकारक प्रदूषित कारखानों में काम करते हैं, जिनकी ईट की दीवारों पर कालिख जमी रहती है और जिनकी हवा में विषाद्जनक बू होती है। वे ऐसी भट्टियों के पास काम करते हैं, जो 1400° सेल्सियस ताप पर जलती है। वे आर्सेनिक और पोटेशियम जैसे खतरनाक रसायनों को काम में लेते हैं। वे कांच-धमन (glass blowing) की इकाइयों में कार्य करते हैं, जहाँ उनके फेफड़ों पर जोर पड़ता है, जिससे तपेदिक जैसी बीमारियाँ होती है। कई बार ऐसा भी होता है जब उनके बदन में दर्द होता है, दिमाग परेशान होता है, उनका दिल रोता है और आत्मा दुःखी रहती है, लेकिन तब भी अपने मालिकों के आदेश पर उन्हें 12-15 घण्टे लगातार काम करना पड़ता है।

बाल श्रम कानून क्या है

कारखानों, खदानों एवं जोरखिम वाले उद्यमों में 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों के नियोजन को रोकना एवं अन्यनियोजनों में बालकों की कार्यस्थिति को नियन्त्रित करना भारत सरकार की नीति है। बाल-श्रम (निषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986 पहला विस्तृत कानून है, जो 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को व्यवस्थित उद्योगों एवं अन्य कठिन औद्योगिक व्यवसायों (जैसे बीड़ी, कालीन, माचिस, आतिशबाजी आदि के निर्माण) में रोजगार देने पर प्रतिबन्ध लगाता है। इन्हें अधिनियम की अनुसूची के भाग ‘क’ एवं ‘ख’ में सूचीबद्ध किया गया है। इस अधिनियम का खण्ड बाल-श्रम तकनीकी सलाहकार समिति के गठन का सुझाव देता है, जिससे अधिनियम की अनुसूची में व्यवसायों एवं प्रक्मों को सम्मिलित करने के लिए केन्द्र सरकार को सुझाव दिए जा सके।

बाल श्रम (प्रतिषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986 को कायान्वित करने का अधिकार राज्य सरकार को दिया गया है। राज्य में श्रम विभाग को अपने निरीक्षणालय तन्त्र के माध्यम से परिवर्तित करने का अधिकार प्राप्त है। सरकार के बाल-श्रम कानून-1986 के अन्तर्गत ऐसे क्षत्रों को चुना है जहाँ अधिक संख्या में बाल मजदूर रह रहे हों एवं जो हानिकारक उद्योगों में काम कर रहे हों। सरकार ने देश के लगभग 250 जिलों में राष्ट्रीय बाल-श्रम प्रोजेक्ट तथा 21 जिलों में इण्डस प्रोजेक्ट द्वारा जिलाधिकारियों को आदेश दे रखा है कि वे बाल-श्रम को दूर करने के लिए हरसम्भव प्रयास करें । इसके लिए विशेष स्कूल संचालित किए जाएँ, बाल मजदूरों के परिवारों हेतु आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जाए तथा 18 वर्ष से पूर्व किसी भी स्थिति में उनसे मजदूरी न कराई जाए।

बाल श्रम की सजा क्या है

भारत सरकार द्वारा बाल-श्रम अधिनियम 1986 के अंतर्गत अगर कोई व्यक्ति अपने व्यवसाय में पैसा कमाने के उद्देश्य से 14 बर्ष से कम आयु के बच्चे से कार्य कराता है तो उस व्यक्ति को 2 साल की सज़ा और 50 रुपये का जुर्माना लगाने का प्रावधान किया गया है।

वास्तव में हम यह सोचते हैं कि इस तरह की सामाजिक कुरीतियों को समाप्त करने का दायित्व सिर्फ सरकार का है। सब कुछ कानूनों के पालन एवं कानून भंग करने वालों को सजा देने से सुधारा जाएगा, लेकिन यह असम्भव है। हमारे घरों में, ढाबों में, होटलों में अनेक बाल- श्रमिक मिल जाएँगे, जो कड़ाके की ठण्ड या तपती धूप की परवाह किए बगैर काम करते हैं। सभ्य होते समाज में यह अभिशाप अभी तक भी क्यों बरकरार है? क्यों तथाकथित सभ्य एवं सुशिक्षित परिवारों मे नौकरों के रूप में छोटे बच्चों को पसन्द किया जाता है? आर्थिक रूप से सशक्त लोगों को घर के कामकाज हेतु गरीब एवं गाँव के बाल श्रमिक ही पसन्द आते हैं। इन छोटे श्रमिकों की मजबूरी समझिए कि इनके छोटे-छोटे कन्धों पर बिखरे हुए परिवारों के बड़े बोझ हैं।

आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकारी स्तर से लेकर व्यक्तिगत स्तर तक सभी लोग इसके प्रति सजग रहें और बाल-श्रम के कारण बच्चों का बचपन न छिन जाए, इसके लिए कुछ सार्थक पहल करें। हम सबका दायित्व है कि इनकी दशा-परिवर्तन हेतु मनोयोगपूर्वक साथर्थक प्रयास करें, जिसंसे राष्ट्र के भावी नागरिकों के बालपन की स्वाभाविकता बनी रह सके।

Conclusion –

आज हम 21वीं सदी में विकास और सभ्यता की ऐसी अवस्था में जी रहे हैं, जहाँ समानता, धर्मनिरपेक्षता, मानवीयता आदि की चर्चवा बहुत जोर-शोर से की जा रही है। लेकिन हमारी प्रगति, शिक्षा, स्वदना एवं मानवता पर बाल- श्रम की समस्या कई गम्भीर सवाल भी खड़े कर रही है।

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FAQ,s

Q- बाल श्रम क्या है?

Ans – बाल-श्रम का मतलब यह है कि 14 वर्ष से कम उम्र के बालक को काम पर लगाना गैर कानूनी है अगर कोई व्यक्ति, कंपनी या किसी होटल में किसी बालक जिसकी उम्र 14 वर्ष से कम है ऐसे बालक पर मजदूरी करवाई जाती है तो कानून विरुद्ध करवाए गए इसी श्रम को बाल श्रम कहते हैं।

Q- बाल श्रमिक कौन होता है?

Ans – 14 वर्ष से कम उम्र के बालक को काम पर लगाना गैर कानूनी है अगर कोई व्यक्ति, कंपनी या किसी होटल में किसी बालक जिसकी उम्र 14 वर्ष से कम है ऐसे बालक पर मजदूरी करवाई जाती है तो कानून विरुद्ध करवाए गए इसी श्रम को बाल श्रम कहते हैं। और श्रम करने वाले बालकों को बाल श्रमिक और बाल मजदूर कहते है।

Q- बाल श्रम कानून क्या है?

Ans – बाल-श्रम (निषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986 पहला विस्तृत कानून है, जो 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को व्यवस्थित उद्योगों एवं अन्य कठिन औद्योगिक व्यवसायों (जैसे बीड़ी, कालीन, माचिस, आतिशबाजी आदि के निर्माण) में रोजगार देने पर प्रतिबन्ध लगाता है।

Q- बाल श्रम कराने की सजा क्या है?

Ans – भारत सरकार द्वारा बाल-श्रम अधिनियम 1986 के अंतर्गत अगर कोई व्यक्ति अपने व्यवसाय में पैसा कमाने के उद्देश्य से 14 बर्ष से कम आयु के बच्चे से कार्य कराता है तो उस व्यक्ति को 2 साल की सज़ा और 50 रुपये का जुर्माना लगाने का प्रावधान किया गया है।

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