ऊर्जा संकट पर निबंध Essay on Energy Crisis Its Causes and Solutions in Hindi

ऊर्जा संकट पर निबंध । Essay on Energy Crisis Its Causes and Solutions in Hindi

आज के लेख में “ऊर्जा संकट पर निबंध Essay on Energy Crisis Its Causes and Solutions in Hindi” के बारे में जानकारी में ऊर्जा संकट क्या है और ऊर्जा संकट के मुख्य कारण और समाधान के साथ साथ ऊर्जा संकट का अर्थ और परिभाषा बताई गई है।

Urja Sanakat Par Nibandh खासकर स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के लिए कक्षा 4,5,6,7,8,9,10,11 और कक्षा 12 के लिए रिसर्च कर 500, 600, 700, 800, 900 और 1000 शब्दों तक तैयार किया गया है। चलिए शुरु करते है ऊर्जा संकट पर निबंध हिंदी में PDF।

ऊर्जा संकट पर निबंध Essay on Energy Crisis in Hindi

प्रस्तावना :- ऊर्जा संकट के समय में आज भारत के साथ-साथ विश्व के सभी देश विकास की दौड़ में सबसे आगे निकलकर प्रथम बनने के प्रयास में लगे हुए हैं। ऊर्जा संकट से उभर कर सभी देश औद्योगीकरण से लेकर प्राकृतिक संसाधनों के दोहन तक के हर सम्भव-असम्भव उपाय कर रहे है।

आज विश्व के सभी देश की सरकारें यह अच्छे से जानती है कि विकास के लिए हमें ऊर्जा के प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करना पड़ता है। पिछली शताब्दी में ऊर्जा के प्राकृतिक संसाधनों का बहुत दोहन हुआ है।

ऊर्जा क्या है?

ऊर्जा संकट को ठीक से समझने के लिए हमें सबसे पहले यह जानना होगा कि ऊर्जा क्या है? ऊर्जा वह शक्ति है, जिसकी सहायता से कोई क्रिया सम्पन्न की जाती है। मनुष्य को कार्य करने के लिए ऊर्जा भोजन से मिलती है। हम अपने दैनिक जीवन में वैज्ञानिक यन्त्रों का प्रयोग करते हैं। इन वैज्ञानिक यन्त्रों को चलाने के लिए हमें खनिज तेल एवं विद्युत की आवश्यकता होती है। इस तरह वैज्ञानिक यन्त्रों (जैसे मोटरगाड़ी, ट्रेन, इत्यादि) के उर्जा का स्रोत खनिज तेल या विद्युत होता है। जिन संसाधनों से हमें ऊर्जा प्राप्त होती है, उन्हें हम ऊर्जा के स्त्रोत कहते हैं।

ऊर्जा के मुख्य स्त्रोत

कोयला, प्राकृतिक गैस, खनिज तेल, सूर्य, पवन, जल, इत्यादि ऊर्जा के विभिन्न ऊर्जा के मुख्य स्त्रोत हैं। कोयला, खनिज तेल, प्राकृतिक गैस इत्यादि का प्रयोग सदियो से हो रहा है, इन्हें ऊर्जा के परम्परागत स्त्रोत कहा जाता है। ऊर्जा के ये परम्परागत स्रोत सीमित हैं। इन्हें जीवाश्म ईधन भी कहा जाता है।

“ऊर्जा संकट” से तात्पर्य

जिस तरह कोयला, खनिज तेल, प्राकृतिक गैस, सूर्य, पवन, जल, इत्यादि ऊर्जा के विभिन्न स्त्रोतों का दोहन वर्तमान में हो रहा है, यदि इसी तरह आगे भी होता रहा तो यकीनन मानिए वर्ष 2050 के बाद पृथ्वी पर इन संसाधनों का अभाव हो जाएगा। ऊर्जा के संसाधनों के अभाव की यह स्थिति ऊर्जा संकट कहलाती है।

इन्हें प्राकृतिक रूप से निर्मित होने में लाखों वर्ष का समय लगता है। जिस अनुपात में औद्योगीकरण में वृद्धि हो रही है, उससे यह अनुमान लगाया जाता है कि अगले 40-50 वर्षों के भीतर इन संसाधनो के समाप्त होने के आसार है। पूरा विश्व मुख्य रूप से इन्हीं ऊर्जा संसाधनों पर निर्भर है। कोई भी देश अपने आर्थिक विकास को धीमा करने की कीमत पर ऊर्जा संरक्षण नहीं करना चाहता, इसलिए भी ऊर्जा संकट की स्थिति गम्भीर होती जा रही है।

ऊर्जा संकट का कारण

सभी प्राकृतिक संसाधन पृथ्वी पर सीमित मात्रा में हैं। जिस तरह से विश्व की जनसंख्या बढ़ रही है उससे यह अनुमान लेगाया जा रहा है कि 2030 ई. तक यह बढ़कर 8 अरब से भी अधिक हो जाएगी तथा जिस तरह से प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग किया जा रहा है उसका दुष्परिणाम यह होगा कि आने वाली पीढ़ियों के लिए आवश्यक प्राकृतिक संसाधन भी पृथ्वी पर उपलबध नहीं होंगे। किन्तु, मानव को जीने के लिए प्राकृतिक संसाधनो का उपयोग करना ही होगा, क्योंकि इसके बिना जीवन सम्भव नहीं है।

इसलिए अर्थशास्त्रियों, पर्यावरणविदों एवं वैज्ञानिकों ने इस समस्या का हल यह बताया कि हमें अपने विकास के लिए उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करते समय इस बात का भी ख्याल रखें कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी ये बचे रहें। इस तरह सतत विकास (सस्टेनेबल डेवलपमेन्ट) की अवधारणा का विकास हुआ।

सतत विकास एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें वर्तमान आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए उपलब्ध संसाधनो का उपयोग करते समय इस बात का ध्यान रखा जाता है कि भावी पीढ़ी की आवश्यकताओं में भी कटौती न हो।

सतत विकास में सामाजिक एवं आर्थिक विकास के साथ-साथ इस बात का ध्यान रखा जाता है कि पर्यावरण भी सुरक्षित रहे। विकास एवं पर्यावरण एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं, अपितु एक-दूसरे के पूरक है। सन्तुलित एवं शुद्ध पयोवरण के बिना मानव का जीवन कष्टमय हो जाएगा।

हमारा अस्तित्व एवं जीवन की गुणवत्ता एक स्वस्थ प्राकृतिक पर्यावरण पर निर्भर है। विकास हमारे लिए आवश्यक है और इसके लिए प्राकृतिक संसाधनों का दोहन भी आवश्यक है, किन्तु ऐसा करते समय हमें सतत विकास की अवधारणा को अपनाने पर जोर देना चाहिए।

परमाणु ऊर्जा का प्रयोग कर कोयला एवं खनिज तेल जैसे प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण किया जा सकता है। नाभिकीय विखण्डन के दौरान उत्पन्न उर्जा को नाभिकीय या परमाणु ऊुर्जो कहा जाता है।

जब यूरेनियम पर न्यूट्रॉनों की बमबारी की जाती है, तो एक यूरेनियम नामिकीय विखण्डन के फलस्वरूप बहुत अधिक ऊर्जा व तीन नए न्यूट्रॉन उत्सर्जित होते हैं। ये नव ‘उत्सर्जित न्यूट्रॉन’ यूरेनियम के अन्य नाभिकों को विखण्डित करते हैं। इस प्रकार यूरेनियम नाभिकों के विखण्डन की एक भृंखला बन जाती है। इसी शृंखला अभिक्रिया को नियन्त्रित कर परमाणू रिएक्टरों में परमाणु ऊर्जा का उत्पादन किया जाता है।

जहाँ 1000 वाट के थर्मल पॉवर संयन्त्र को चलाने के लिए 300 लाख टन कोयले की आवश्यकता होती है, वहीं इतना ही विद्युत उत्पादन नाभिकीय रिएक्टर में मात्र 30 टन यूरेनियम से सम्भव है। रिएक्टर से प्राप्त विद्युत ऊर्जा का उपयोग विभिन्न उद्योगों में किया जाता है।

ऊर्जा संकट का समाधान

ऊर्जा संकट के समाधान के लिए हमारे लिए इसके गैर-परम्परागत स्रोतों का विकास करना आवश्यक हो गया है। सौर ऊर्जो, पवन ऊर्जो, बायोगैस, भूतापीय ऊर्जा, इत्यादि ऊर्जा के गैर-परम्परागत स्रोत हैं। केवल औैर परम्परागत स्त्रोतों के विकास से ही ऊर्जा संकट का समाधान सम्भव नहीं है, हमें पारम्परिक ऊर्ज संसाधनों का भी संरक्षण करना होगा।

ऊर्जा संकट की समस्या के समाधान के लिए आधुनिक ऊर्जो स्रोतों में जल-विद्युत को भी विशेष महत्तव दिए जाने की आवश्यकता है। जीवाश्म ईधन के विपरीत यह एक बार प्रयोग के बाद नष्ट नहीं होता। इसे नवीकरणीय ऊर्जा’ स्रोत कहा जाता है। इसके अतिरिक्त, बायोडीजल का व्यापक प्रयोग भी ऊर्जा संकट का एक अच्छा समाधान हो सकता है। बायोडीजल बनाने के लिए सोयाबीने, अलसी, महुआ, अरण्डी जैसे कृषिजन्य उत्पादों से प्राप्त वसा या वनस्पति तेल का प्रयोग किया जाता है। बायोडीजल वह वैकल्पिक ईधन है। जो पूरी तरह से जलकर ऊर्जा देता है।

उपसंहार –

बढ़ती जनसंख्या हेत् ऊर्जा की आपूर्ति करना विश्व के लिए एक समस्या का रूप लेता जा रहा है। आने वाले समय में ऊर्जा की माँग में पूरे विश्व में काफी वृद्धि होने का अनुमान है। बढ़ती जनसंख्या, फलती-फूलती अर्थव्यवस्था और अच्छे जीवन-स्तर की चाह के कारण प्राथमिक ऊर्जो खपत में भी वृद्धि हुई है। ऐसी स्थिति में पूरे विश्व के लिए ऊर्जा संरक्षण को विशेष महत्त्व देना अनिवार्य हो गया है।

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FAQ,S

Q- ऊर्जा संकट क्या है?

Ans – जिस तरह कोयला, खनिज तेल, प्राकृतिक गैस, सूर्य, पवन, जल, इत्यादि ऊर्जा के विभिन्न स्त्रोतों का दोहन वर्तमान में हो रहा है, यदि इसी तरह आगे भी होता रहा तो यकीनन मानिए वर्ष 2050 के बाद पृथ्वी पर इन संसाधनों का अभाव हो जाएगा। ऊर्जा के संसाधनों के अभाव की यह स्थिति ऊर्जा संकट कहलाती है।

Q- ऊर्जा संकट से तात्पर्य क्या है?

Ans – जिस तरह कोयला, खनिज तेल, प्राकृतिक गैस, सूर्य, पवन, जल, इत्यादि ऊर्जा के विभिन्न स्त्रोतों का दोहन वर्तमान में हो रहा है, यदि इसी तरह आगे भी होता रहा तो यकीनन मानिए वर्ष 2050 के बाद पृथ्वी पर इन संसाधनों का अभाव हो जाएगा। ऊर्जा के संसाधनों के अभाव की यह स्थिति ऊर्जा संकट कहलाती है।

Q- ऊर्जा संकट के कारण क्या है?

Ans – जिस तरह से विश्व की जनसंख्या बढ़ रही है उससे यह अनुमान लगाया जा रहा है कि 2030 ई. तक यह बढ़कर 8 अरब से भी अधिक हो जाएगी तथा जिस तरह से प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग किया जा रहा है उसका दुष्परिणाम यह होगा कि आने वाली पीढ़ियों के लिए आवश्यक प्राकृतिक संसाधन भी पृथ्वी पर उपलबध नहीं होंगे।

Q- ऊर्जा के मुख्य स्त्रोत क्या है?

Ans – कोयला, प्राकृतिक गैस, खनिज तेल, सूर्य, पवन, जल, इत्यादि ऊर्जा के विभिन्न ऊर्जा के मुख्य स्त्रोत हैं।

Q- ऊर्जा संकट का समाधान बताइए?

Ans – ऊर्जा संकट की समस्या के समाधान के लिए आधुनिक ऊर्जो स्रोतों में जल-विद्युत को भी विशेष महत्तव दिए जाने की आवश्यकता है। जीवाश्म ईधन के विपरीत यह एक बार प्रयोग के बाद नष्ट नहीं होता। इसे नवीकरणीय ऊर्जा’ स्रोत कहा जाता है। इसके अतिरिक्त, बायोडीजल का व्यापक प्रयोग भी ऊर्जा संकट का एक अच्छा समाधान हो सकता है। बायोडीजल बनाने के लिए सोयाबीने, अलसी, महुआ, अरण्डी जैसे कृषिजन्य उत्पादों से प्राप्त वसा या वनस्पति तेल का प्रयोग किया जाता है। बायोडीजल वह वैकल्पिक ईधन है। जो पूरी तरह से जलकर ऊर्जा देता है।

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